Praan Ka Chanchal

प्राण का चंचल भाव ही श्वांस(inhale) प्रश्वास(exhale) है। यह कभी left(इडा) तो कभी right(पिंगला)नासिका से मे बहती है। इस इडा और पिंगला मे श्वांस के प्रवाह का नाम ही संसार है। अर्थात जब तक इनमे श्वांस का प्रवाह रहेगा तब तक हमारी पाप वासना नष्ट नहीं हो सकती। परंतु भगवान् कहते हैं कि पाप के विनाश के लिए वह युग युग मे अवतीर्ण होते है। तो अखिर यह युग क्या है? – श्वांस जब इडा से पिंगला मे आता है तब एक बार सुषुम्ना से होकर आता है और जब पिंगला से इडा मे जाता है तब भी सुषुम्ना से होकर ही जाता है इसलिए यह जो इडा और पिंगला का सुषुम्ना के साथ योग है, यही युग कहलाता है। इस मिलन के संधि काल मे भगवान् का आविर्भाव होता है। योगी लोग इस मिलन काल को साधना के द्वारा बढ़ाते हैं। इस युग संधि मे भगवान् के प्रकाश का अनुभव होता है। यही है उनका युग युग मे आविर्भाव।
जय गुरु जी